29 September 2020

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चाला रीती से निर्मित मंदिरों का गांव मलूटी का इतिहास 500 वर्ष पुराना

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चाला रीती से निर्मित मंदिरों का गांव मलूटी का इतिहास 500 वर्ष पुराना
बेबाक अड्डा, दुमका
झारखंड की उप राजधानी दुमका जिले में अवस्थित शिकारीपाड़ा के निकट का छोटा सा गांव मलूटी मंदिरों का गांव के रूप में भी जाना जाता है. यहां 74 पुराने मंदिर जीर्ण अवस्था में है. 1720 ई से लेकर 1840 ई के मध्य में बाज बसंत राजवंशों के काल में कुल 108 मंदिरों का निर्माण चाला रीती द्वारा किया गया था. मलूटी में जगह-जगह प्राचीन मंदिरों के होने की वजह से इसे गुप्तकाशी भी कहा जाता है. इतिहासकारों की माने तो मलूटी का इतिहास 500 वर्ष से भी ज्यादा पुराना है. बाज बसंत वंश के राज्यकाल में बने इन मंदिरों में रामायण, महाभारत व अन्य हिंदू ग्रंथों की कथाओं के दृश्यों का अद्भुत चित्रण है. यहां के मंदिरों की पाषाण मूर्तियां और फलक प्राचीन स्थापत्य कला के अनोखे और दुर्लभ प्रमाण हैं. यही वजह है कि यहां सालों भर पर्यटक मंदिरों में उकेरे दृश्य व अद्भुत चित्रण को देखने आते हैं.
राजाओं के बीच महल बनाने की बजाय मंदिर बनाने की होड़ थी
एक छोटा सा कस्बा मलूटी में इतने सारे मंदिर निर्माण के पीछे भी बहुत ही रोचक कहानी है. यहां के राजाओं में अच्छे से अच्छा मंदिर बनाने की हर वक्त होड़ सी लगी रहती थी. नतीजा यहां का राजा महल बनाने की बजाय मंदिर का निर्माण ज्यादा पसंद करते थे. नतीजा गांव में जगह-जगह भव्य मंदिर का निर्माण हो गया था.
एकीकृत बिहार में मलूटी को संवारने की योजना थी
पर्यटकों का बड़ा केंद्र मलूटी को सवारने की योजना बनी थी. एकीकृत बिहार के वक्त वर्ष 1984 में पुरातत्व विभाग ने मलूटी गांव को पुरातात्विक प्रांगण के रूप में विकसित करने की योजना बनाई थी. इसके तहत विभिन्न मंदिरों का संरक्षण कार्य शुरू किया गया था. लेकिन विडंबना है कि यहां आज भी मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है. 
 
एक अनाथ किसान बन गया था यहां का राजा
इतिहासकारों की मानें तो सबसे पहले यह गांव ननकार राजवंश के समय में प्रकाश में आया था. गौर के सुल्तान अलाउद्दीन हसन शाह ने इस गांव को बाज बसंत राय को इनाम में दे दिया था. वे एक अनाथ किसान थे. 1695 ई में राजा बाज बसंत राय के वंशज राजाराम चंद्र ने मलूटी को बसाया था. उन्होंने इन मंदिरों का निर्माण 1720 ई से लेकर 1840 ई के मध्य कराया था. इन मंदिरों का निर्माण सुप्रसिद्ध चाला रीति से किया गया है. यहां छोटे-छोटे लाल सुर्ख ईटों से निर्मित मंदिरों की ऊंचाई 15 फीट से लेकर 60 फीट तक हैं. आज भी इन मंदिरों की दीवारों पर रामायण-महाभारत के दृश्यों का चित्रण बेहद खूबसूरती से देखा जा सकता है. बाज बसंत राजवंशों के काल में कुल 108 मंदिरों का निर्माण किया गया था.
नाम के आगे बाज लगाने की भी अलग कहानी
राजा बसंत के नाम के आगे बाज लगाने की कहानी भी अनोखी है. एक बार सुल्तान अलाउद्दीन की बेगम का पालतू पक्षी बाज उड़ गया. बाज को उड़ता देख गरीब किसान बसंत ने उसे पकड़कर रानी को वापस लौटा दिया. बसंत के काम से खुश होकर सुल्तान ने मलूटी गांव उन्हें इनाम में दे दिया था. जिसके बाद बसंत किसान से राजा बाज बसंत के नाम से पहचाने जाने लगे.
यहां भगवान शिव के मंदिरों के साथ दुर्गा, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु आदि देवी-देवताओं के भी मंदिर
मलूटी में मंदिरों का निर्माण अलग-अलग समूह में किया गया है. यहां मौलिक्षा माता का भी मंदिर है. इसकी मान्यता जाग्रत शक्ति देवी के रूप में है. काली पूजा के मौके पर यहां बलि देने की भी परंपरा है.
यहां भगवान शिव के मंदिरों के साथ दुर्गा, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु आदि देवी-देवताओं के भी मंदिर है. मलूटी मंदिर का सीधा संबंध शक्तिपीठ तारापीठ से है. वामाखेपा की जीवन लीला मां तारा से जुड़ी थी, उनकी समाधि तारापीठ में है. यही वजह है कि आज भी वामाखेपा का त्रिशूल मलूटी में स्थापित है.
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Author: Bebaak adda

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