28 November 2021

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कहो खुल के

समाज में पुलिस, प्रेस व पॉलीटिशियन का महा गठजोड़ है

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समाज में पुलिस, प्रेस व पॉलीटिशियन का महा गठजोड़ है
उपन्यास ढाई चाल के लेखक नवीन चौधरी ने कहा


बेबाक अड्डा, देवघर/रांची

देश के युवा लेखक नवीन चौधरी की उपन्यास ‘ढाई चाल’ ऑनलाइन एवं ऑफलाइन प्लेटफार्म पर धूम मचा रखी है. ब्लॉगिंग की दुनिया से लेखनी के क्षेत्र में कदम रखने वाले नवीन चौधरी का वर्ष 2018 में राजस्थान छात्र राजनीतिक पर केंद्रित आया पहला उपन्यास जनता स्टोर की कामयाबी से हर कोई वाकिफ हैं. यह उपन्यास दैनिक जागरण नील्सन की टॉप-10 हिंदी बेस्ट सेलर की सूची में सूचीबद्ध रहा है. जयपुर से स्कूलिंग कर एम ए इन इकोनॉमिक्स की डिग्री राजस्थान से हासिल की. प्रोफेशनल कोर्स एमबीए इन मार्केटिंग की डिग्री मोदीनगर से प्राप्त की. पिता अर्कनाथ चौधरी पेशे से संस्कृत के प्रोफेसर होने के साथ-साथ गुजरात में कुलपति के पद को भी सुशोभित कर चुके हैं. वो मूलतह बिहार के मधुबनी जिले के रहने वाले हैं. देवघर में इनका ससुराल है. ओटीटी प्लेटफॉर्म के जरिए स्क्रीनप्ले लिख रहे नवीन चौधरी से बेबाक अड्डा की टीम ने देवघर में उनसे कई ज्वलंत मुद्दे पर बेबाकी से बात की. उन्होंने सवालों का जवाब भी बेबाकी से दिया.


ब्लॉगिंग की दुनिया से लेखनी के क्षेत्र में कैसे आना हुआ, प्रेरणा स्रोत कौन हैं
मेरे पिताजी की काफी किताबें हैं. हालांकि साहित्यिक नहीं है. उनकी किताबें ज्यादातर व्याकरण में है. उनकी कुल 21 किताबें हैं, जो काफी लोकप्रिय है. विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में वो चलती है. लिखने का माहौल पारिवारिक था ही. जब ब्लॉगिंग की दुनिया में आया तो लगा कि इंटरनेट पर लिखना सुविधाजनक है. वहां से वर्ष 2009 में नवीन चौधरी डॉट कॉम से लिखना शुरू किया. ब्लॉग पर व्यंग लिखना शुरू किया. चार-पांच वर्षो तक ब्लॉगिंग चला. फिर मीडिया हाउस से इन्वेस्टिगेशन आने लगा लिखने के लिए. कादंबिनी, लल्लन टॉप डॉट कॉम, जागरण, खबर लाइव, सत्याग्रह जहां मेरा लेख छपता रहा. उसके बाद भरोसा जगा कि ठीक है, जो लिख रहा हूं वह शायद थोड़ा सा ठीक हुआ है. लोग पढ़ रहे हैं. मेरी लेखनी में परिवार का पूर्ण सहयोग मिला है, और मिल भी रहा है. मेरी पहली किताब का प्रकाशन मेरी पत्नी पुष्पा चौधरी (इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर) की वजह से ही हो पाया है. क्योंकि मेरे को आलस आ जाता था. कई बार खुद को डाउट्स होता था कि क्या मुझे लिखना चाहिए या नहीं. हम अच्छा लिख पाएंगे. ब्लॉक अलग चीज होता है, उपन्यास अलग चीज. पत्नी ने दो पेज हर रोज लिखने का टारगेट दे दिया था. पहला उपन्यास ठीक प्रकार से मार्केट में आ गया. अब तो मेरा बेटा भी चीजों को देखकर समझ रहा है. शायद भविष्य में वह भी कभी ऐसा कर पाए.

दूसरी उपन्यास ढाई साल को बाजार में आने में 3 वर्ष का वक्त क्यों लगा
उपन्यास जनता स्टोर दिसंबर 2018 में मार्केट में आया था. यह उपन्यास राजस्थान छात्र राजनीतिक पर केंद्रित है. उस वक्त से लगा कि राजनीतिक पर मनोरंजक तरीके से बातों को नहीं बताई जा रही है. ब्लॉगिंग भी सात-आठ वर्षों से कर रहा था. अमूमन किताबों में राजनीति के दांव पेच कम दिखाया जाता है. ज्यादातर प्रेम कहानी बन जाता है. प्रेम कहानी रहते हुए भी किस तरह का राजनीतिक दांवपेच है, राजनीतिक किस प्रकार उसके अंदर घुस जाती है, यह सब उसके अंदर था. फिर मुझे लगा की राजनीति के ऊपर मनोरंजक तरीके से लोग चीजों को नहीं बता पा रहे हैं. लेखक बहुत ज्यादा लिख नहीं पा रहे हैं. उसी के बाद विचार आया कि ढाई चाल लिखना चाहिए. काफी रिसर्च किया. करीब 3 वर्ष बाद ढाई चाल उपन्यास मार्केट में आया. हालांकि रिसर्च 50-100 पन्ने का हुआ. लेकिन काम का एक ही पेज था. राइटिंग के समय लगा कि हम कहानी लिख रहे हैं तो, वो तथ्यात्मक हो. अधिक से अधिक थीम हो.


उपन्यास ढाई चाल का थीम क्या है, यह शीर्षक कहां से लिया गया है
उपन्यास ढाई चाल पुलिस, राजनीति एवं मीडिया तीनों का गठजोड़ है. यह किस प्रकार से काम करता है. मीडिया के अंदरूनी वर्किंग, राजनीतिक में जिस प्रकार से राजनेता चीजों को घुमाते हैं आदि का मिश्रण है. इसमें एक रेप केस को आधार बनाया है. कैसे रेप केस के अराउंड में पूरी घटना क्रम है. जिसमें गाय की राजनीति का हिस्सा है, अवैध हथियारों का धंधा वह किस प्रकार से चलाता है, वो सभी चीजें इसमें कवर है. राजनीति में राजनीति लगना चाहिए. राजनीति में कम ऐसा मौका आता है. जब आमने-सामने वार होता है. लोग हमेशा ऐसा एक मोहरा तैयार करते हैं. जिसका लगाया हुआ वह चीजों को खत्म कर देता है. शतरंज में घोड़े का चाल सबसे खतरनाक होता है. घोड़ा एक बार राजा को शह दे देगा तो राजा को अपना जगह छोड़ना पड़ेगा. राजा घोड़े का नुकसान नहीं कर सकता है. उपन्यास में जितने भी पात्र हैं, वो सब यही कर रहे हैं. अगर आप से शत्रुता है तो मैं आप पे अटैक नहीं करके उसे घोड़े की तरह इस्तेमाल करूंगा. आपको अपनी जगह छोड़नी पड़ेगी. मेरा लाभ हो जाएगा. आप उनका नुकसान नहीं कर पाएंगे. इसमें जितने भी पात्र है, हर कोई इसी प्रकार एक दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं. किस प्रकार शतरंज की बिसात बिछी हुई है. कहानी में यह दिखाता है. जनता को बाहर से देख कर लगता है कि, अरे यह क्या है. वो घूम जाती है.


पुलिस, राजनीति एवं मीडिया में जनता कहां है
रेप केस आम जनता की है. यह न्याय पाने की लड़ाई है. पुलिस उसे किस प्रकार से देखती है. अगर बाद में राजनेता इंवॉल्व हो गया है तो वहीं पुलिस चीजों को किस प्रकार से देखती है. मीडिया एक तरफ मुद्दा को उठाती है. दूसरी तरफ व्यवसायिकता उसके अंदर हावी होती है. उस व्यवसायिकता का एंगल कई बार संपादकों व पत्रकारों को भी नहीं पता होता है. वो मैनेजमेंट को पता होता है. वो जो दबाव संपादकों पर आता है. इसमें उसका जिक्र है. जनता की आवाज मीडिया उठाना भी चाहे तो किस प्रकार मैनेजमेंट अपने हितों के कारण किस प्रकार से उसे दबा देता है. आम आदमी की लोकतंत्र से अपेक्षा को किस प्रकार से तोड़ा जाता है. अंततः मीडिया ही वह स्तंभ है, जो उम्मीद के रूप में निकलता है. जहां चीजें बदल जाती है.


कहानी का विषय चुनना कितना चुनौतीपूर्ण है
कहानी का विषय चुनने के वक्त लगा कि कौन सा विषय को चुना जाए. मुझे लगा कि लेखक के तौर पर मैं नया क्या दिखाने जा रहा हूं. प्रेम कहानी बहुत लिखी गई है. उसमें नयापन लाया जा सकता है. लेकिन राजनीति का यह एंगल कहीं ना कहीं मिसिंग था. मुझे लगा की सच्चाई को दिखाना चाहिए. खबरें जो व्हाट्सएप के माध्यम से आती है. उसे सही मान लेते हैं. लेकिन उसके पीछे के गणित किस प्रकार से हमारे दिमाग को घुमा देता है. वो इसके अंदर है. सोशल मीडिया में हैजटेक पूरा चलता है. लोग भावना में बहकर चले जाते हैं. इसमें पात्र का डायलॉग है कि जनता को न्याय नहीं चाहिए, बल्कि जनता को अपनी उत्तेजना निकालने का मौका चाहिए. वो देखती है कि एक दिन हैजटेक होगा, कल हम कुछ और कर देंगे. यह जो मानसिकता राजनेताओं की समझी गई है उसका इस्तेमाल होता है.


युवा चेहरा अपने को लिखने के क्षेत्र से अलग रखे हुए हैं, उनसे क्या उम्मीद है
अभी माहौल बदल रहा है. नई चीजें आ रही है. जब भी नई चीजें आएगी, वहां डिस्ट्रक्शन तो होगा ही. लेकिन पुराने पैटर्न को देखें तो मूलभूत चीजों की तरफ आते हैं. लेखक के तौर पर मैंने देखा कि शुरुआत में काफी डीप आया. लेकिन इंटरेस्ट धीरे धीरे आना शुरू हुआ है. पेरेंट्स भी बच्चों पर दबाव बना रहे हैं. कोर्स की किताबों से अलग पढ़ाई करें. आने वाले 10-15 वर्षों में या पॉजिटिव साइड में लेकर जाएगा. यह इसलिए भी जरूरी है कि फिल्म कहीं ना कहीं दिशा दिखाती है. किताबें जब आप पढ़ना शुरू करते हैं तो आप नया समाज देखते हैं. नए विचार को देखते हैं. मुझे लगता है कि जब एक बच्चे का मानसिक विकास होगा. वो जो एक ही चीजों को कई तरह से देखेंगे, सोचेंगे. इसके बाद निर्णय लेंगे. कहीं ना कहीं अखबार-किताब को पढ़ना उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है. वर्तमान स्थिति में थोड़ा कठिन जरूर है. लेकिन नए सारे लेखक के आने के बाद युवाओं ने पढ़ना शुरू किया है. टियर 2, टियर 3 सिटी से बहुत पाठक बढ़े हैं. पहली कहानी जयपुर की राजनीति से थी. लेकिन जयपुर से जायदा राजस्थान के अंदर बाड़मेर, जालौर, नागौर से जायदा पाठक आए. बिहार के भी काफी पाठक दरभंगा, सुपौल, बेगूसराय से आए. उनकी प्रतिक्रिया थी कि मैंने यह किताबें पढ़ी. मुझे लग रहा है कि पुनः पुराना पैटर्न आने लगा है. जहां यह माना जाता था कि इंटरनेट आने के बाद सब खत्म हो जाएगा. वैसा नहीं है. किताबों को पढ़ा जा रहा है.


वर्तमान में शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत क्या है, इसे किस रूप में देखते हैं.
मेरे ख्याल से शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था का निजीकरण नहीं होना चाहिए. सरकार को खुद इसे चलाना चाहिए. जिनके पास पैसा होता है, वो प्राइवेट शिक्षा व्यवस्था में चले जाते हैं. वहां की शिक्षा व्यवस्था भी उसी अनुरूप मोलट किया जाता है. आज बहुत सारे इंटरनेशनल स्कूल खुल गए हैं. लाखों रुपया फीस लिया जाता है. गार्जियन को लगता है कि बच्चों को विदेश भेजना है, तो उसे उसी अनुरूप पढ़ाई कराई जाती है. इससे आर्थिक डिवाइड कम होने की जगह काफी बढ़ रहा है. वर्तमान परिपेक्ष में नौकरी में भारतीय भाषा का योगदान बढ़ना चाहिए. आज अंग्रेजी भाषा पर निर्भरता की समस्या बन गई है. इसी का फायदा प्राइवेट संस्थान वाले उठा रहे हैं. भले ही वह अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई हिंदी में करा रहे हो. यही वजह है कि बच्चे न तो अंग्रेजी भाषा सीख पा रहे हैं, न ही हिंदी भाषा. शिक्षा का निजीकरण बंद होना चाहिए. ताकि समान शिक्षा व्यवस्था सभी के लिए सुलभ हो पाए.


राजनीति में सत्ता एवं विपक्ष को किस रूप में देखते हैं
राजनीति में सत्ता पक्ष वाले हो या विपक्ष वाले, कहीं ना कहीं एक जैसे ही हैं. अगर आप देखे तो जो विपक्ष में रहकर विरोध करते हैं. कुर्सी पर बैठने के बाद वही काम करते हैं. कहीं ना कहीं यह बड़ी समस्या है. मुझे लग रहा है कि जो लोकतांत्रिक अधिकार है. वह सवाल आज गौण है. जिस प्रकार की दुनिया अपने बच्चों के लिए बनाना चाहते हैं. क्या हम उस चीज के लिए सवाल पूछ रहे हैं. मैं जानना चाहता हूं कि जाति धर्म या किसी और आधार पर वोट देने की जगह इस आधार पर वोट दे सकूं कि यह व्यक्ति मेरे इलाके में काम कर सकता है.


भारतवर्ष की अधिकांश योजनाएं वर्ल्ड बैंक के फाइनेंस पर टिकी है. इससे आप क्या समझते हैं.
हमने 70 वर्ष पहले जो स्कीम बनाई. उस में दिक्कत अभी भी दिखती है. बहुत सारी स्कीम आंकड़ों के लिए बनाई गई है, वह काम के लिए नहीं बनाई गई है. लोगों को साक्षर किया जा रहा है, शिक्षित नहीं. जब तक लोग शिक्षित नहीं होंगे. समाज में बदलाव नहीं आएगा. कहीं ना कहीं आदत डाला जा रहा है. किसानों को सब्सिडी मिल रही है. क्या हमेशा उनका कर्ज माफ करते रहेंगे. किसानों को आधुनिक तरीके से खेती के लिए तैयार नहीं कर रहे हैं. हरित क्रांति के वक्त बदलाव आया था. क्या किसानों को इसके लिए तैयार नहीं किया जा सकता है, की नुकसान की स्थिति में भी वो दूसरे तरीके से काम करें. आज मेरे गांव में भी धान की खेती के अलावा अन्य सीजन में खेत खाली पड़ा रहता है. खेतों को हर मौसम के लिए तैयार रखा जाए. इस पर फोकस नहीं है. क्योंकि सरकार ने आदत डाल दी है. यह पूरा सिस्टम जनता को पंगु बनाए रखने के लिए है. जब जनता सख्त हो जाएगी तो नेता को जवाब देना ही पड़ेगा. अगर आज से बदलाव शुरू करें तो आने वाले 20 से 50 वर्ष में यह बदलाव आएगा.


आज नागरिक का परिभाषा बदल गया है. अब देश भक्तों एवं देशद्रोही रह गए हैं. इस ट्रेंड को किस रूप में देखते हैं.
यह जनता की जिम्मेदारी है. आपको यह तय करना होगा कि आप इस तरफ हो या उस तरफ. यह संभव नहीं है कि इस सरकार ने अच्छा काम कर दिया और उसने बुरा कर दिया. पहले या आलोचना होती थी. अब यह हो गया है कि जिस ने यह कह दिया कि सरकार ने यह अच्छा किया है. वह हर चीज को अच्छा कहने लगता है. जिसने बुरा कह दिया, वो हर काम को बुरा कहता है. ये जो डिवाइड हुआ है, वह तार्किक आधार पर नहीं हो रहा है. वह अब वैचारिक आधार पर होने लगा है. इस आधार पर यह डिवाइड हो गया है. इसे एक उदाहरण के तौर पर समझ सकते हैं. मैंने वर्ष 2014 में चार चक्का गाड़ी लिया था. उस वक्त टंकी 1900 रुपया में भरता था. आज उसी टंकी को भरने में 4300 रुपया दे रहा हूं. पिछले 7 वर्षों में मेरी आमदनी 3 गुना तो नहीं बढ़ी, लेकिन पेट्रोल का दाम 3 गुना बढ़ गया है. यह जो सवाल है, इस पर कुछ लोग सरकार का बचाव करने चले आते हैं. लोग तो आने लगे हैं कि आप समझिये देश में इतना विकास कार्य हो रहा है. लेकिन विरोधी हर चीजों का विरोध करने लगता है. इसीलिए जो चीजें सरकार अच्छी कर रही है, उसकी तारीफ होनी चाहिए. जो खराब काम कर रही है, उसका आलोचना भी होना चाहिए. सरकार और विपक्ष जनता को डिवाइड कर रही है. और जनता उसके पीछे पीछे चली जा रही है.


एक जनप्रतिनिधि के लिए अहर्ता एवं छवि कैसा होना चाहिए
मेरे विचार से एक जनप्रतिनिधि के लिए शैक्षणिक योग्यता व अहर्ता के साथ-साथ स्वच्छ छवि का होना बेहद जरूरी है. जब हमारे यहां पढ़े-लिखे लोग कम थे, साक्षरता दर भी कम थी. सब को प्रतिनिधित्व मिले, इसके लिए मौका मिला था. आप लोग पढ़ सकते हैं. मुझे लगता है कि आज शिक्षित जनप्रतिनिधि की आवश्यकता है. ताकि वो नए तरीके से काम कर सकता है. अपराध को रोकने के लिए आपराधिक छवि वाले जनप्रतिनिधि पर विराम लगे. बहुत सारे ऐसे अपराधिक नेता हैं जो हीरो की तरह पूजे जाते हैं. गलती कहीं ना कहीं हमारी है. इसमें बदलाव की आवश्यकता है.


यूपी, बिहार एवं झारखंड के लोग अकड़न एवं जकड़न से नहीं निकल पा रहे हैं, क्यों
मुझे गांव जाने के बाद जो बड़ी समस्या दिखती है. वो यह कि लोग आगे बढ़ने की बजाय जाति के दंभ में लगे हुए हैं. हम ये हैं तो यह काम नहीं ही करेंगे. राजस्थान में भी यही समस्या दिखती है. वहां के राजपूत एक समय में राजा हुए. अब वो राजनीतिक ताकत के लिए स्ट्रगल कर रहे हैं. कारण यह कि वो मानते रहे हैं कि राजपूत हैं, यह वाला काम तो नहीं करेंगे. इस प्रकार के चीजों में बदलाव की आवश्यकता है. आज की तारीख में खुद को समाज के लिए, देश के लिए आगे बढ़ना है. तो आप को बदलना होगा.

बदलते परिवेश में आप रेणू को किस नजरिए से देखते हैं
रेणू ने हमारे समाज को जिस तरीके से दिखाया है. उनका अपना संघर्ष है. समाज के बदलते संघर्ष को उन्होंने देखा है. उसे समझना काफी आसान है. वहां से अगर आते हैं तो बदलाव होता दिखता है. अलग-अलग विचारधारा देखते हैं, विचारों को देखते हैं. जनता की मानसिकता कहीं ना कहीं चेंज होता दिखता है. युवा के सामने मौका है कि वह अपनी सोच को बदलें. सिस्टम को बदल सके. जनता को भी मान लेना चाहिए कि नेता की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हमारी भी जिम्मेदारी है. नेता को सेवा के लिए चुनते हैं. अगर घर में किसी को काम के लिए रखते हैं तो उस पर प्रेशर डालते हैं, काम का. लेकिन जिस नेता को आप चुनते हैं, उस पर काम का दबाव नहीं बना कर जी हुजूरी करते हैं. इस फर्क को समझना होगा. नेता का काम लोकतंत्र के अनुसार हमारा वाजिब हक दिलाना है.


देश के युवा लेखकों के लिए क्या संदेश देंगे
आज की तारीख में इंटरनेट, सोशल मीडिया बड़ा प्लेटफार्म खड़ा है. आप अपनी पहचान ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया के माध्यम से कर सकते हैं. माध्यम को उचित काम के लिए इस्तेमाल करें. अपने लेखन, विचारों को इस प्लेटफार्म के जरिए विस्तार देते हैं तो अपने आप चीजें आगे जाएगा.प्रकाशन की दुनिया से जुड़ा हूं तो हमारे यहां सिस्टमैटिक तरीके से फील्ड के एक्सपर्ट को ले ही आते हैं. लेकिन प्रकाशक यह भी देखते हैं कि सोशल मीडिया पर क्या चीजें चल रही है. कौन अच्छा लिखते हैं. प्रकाशक खुद उनसे संपर्क भी करते हैं. एक लड़का फेसबुक पर मेट्रो की कहानियां लिखता था. प्रकाशक ने खुद उनसे संपर्क किया. ऐसे बिहार झारखंड की स्पेशलिटी है कि हम पढ़ने लिखने वाले लोग हैं. नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर आगे बढ़े. एक बार बेस बन जाएगा तो प्रकाशक खुद आपके पास आएंगे. अगर आप संपर्क करेंगे तो प्रकाशक भी आपको भाव देगा।

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Author: Bebaak adda

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