शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर गुरुओं को सादर समर्पित
by डाॅ विजय शंकर
“सात समंद की मसि करों, लेखनी सब बनराई।
धरती सब कागद करों, गुरु गुण लिखा न जाई।।
समन्वय,सहयोग , सह अस्तित्व और सर्वधर्म समभाव के लिए विसर्जित गुरुजन के प्रति.
” वास्तव में गुरु वो चंदन हैं, जिनके प्रभाव-प्रकाश से हमारे भीतर स्थित विकारों का शमन और अन्तर्निहित गुणों का प्रकाशन होता है।”
वो शिष्य भी धनी हैं, और वो गुरु भी धन्य हैं. जिनके कर्म, ज्ञान तथा आचरण का समाज, राष्ट्र और विश्व में गुरुतर प्रभाव पड़ा है।
रागहीन ,पक्षपात विहीन, सीमा से परे, जाति-धर्म-पंथ से ऊपर उठकर जीवमात्र के प्रति जिसने और जितना सद्कर्म संपादित करते हुए, अपमान-कष्ट -अत्याचार के गरल पिये, वे उतना ही असरदार साबित हुए।
पार्थिव चोला रहे ने रहे, मगर कीर्तिकाया सदैव ध्रुवतारे की तरह चमकती रहेगी।प्राचीन से अर्वाचीन तक, देश से विदेश तक, व्यष्टि से समष्टि तक में गुरुओं की लम्बी परपंरा अनवरत रुप से चलती आ रही है।
वेद, बाइबिल, कुराण, जेंदाअवेस्ता की ख्याति विश्वविदित है।
भारतीय ऋषियों की महिमा, गुरुओं की गरिमा, आदिगुरु महर्षि वाल्मीकि और वेदव्यास की प्रतिभा, स्वामी शंकराचार्य का अप्रतिम ज्ञान, बुद्ध-महावीर की परिवर्तनकारी सोच, नानकदेव का नायकत्व, स्वामी रामकृष्ण का उदारभाव, स्वामी विवेकानन्द की सिंहगर्जना, गुरुदेव रवीन्द्र की अमरवाणी सदैव और सर्वत्र समादृत हैं।
*मुहम्मद पैगम्बर साहब का पुरुषार्थ ,ईसा मसीह का त्याग ,जरथुष्ट की वाणी, सुकरात-अरस्तु की कहानी सभी और सदैव मानवमात्र के पथ को आलोकित करती रहेगी।
हम ज्ञानवृद्ध आचार्य श्रीराम शर्मा, स्वामी शिवानन्द, आचार्य रजनीश (ओशो) प्रज्ञाचक्षु स्वामी रामभद्राचार्य, पूज्य मुरारी बापू, स्वामी अवधेशानन्द गिरी, माता अमृतानन्दमयी (अम्मा जी), योग गुरु बाबा रामदेव, विविध भावों और ज्ञानों से परिपूर्ण श्री श्री रविशंकर जी, प्रजापति ब्रह्मकुमारी (ओम शांति ओम) के पावनश्रीचरणों में कोटि कोटि प्रणाम निवेदित करते हैं।
मेरे सर्वजन !
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता की भाॅति भारतभूमि में गुरुओं की अपरंपार लीला और आवलि है ,विस्तारभय से, अज्ञानतावश, हमने कुछ ही उदाहरणपुष्प चुनें हैं, अत:हमारे त्रुटियों को नज़रंदाज़ कर,नज़रिए पर दृष्टिपात करेंगे।
हम तमाम पंथों, धर्मों के प्रति, उनके धर्माचार्यों और अनुयायियों के प्रति अपना स्नेहसुमन समर्पित करते हैं, जिनके ज्ञान-कर्म और ध्यान से परिवर्तन का जागरण संभव हुआ है।
अंत में, रिखिया पीठाधीश्वरी स्वामी सत्संगी, पूज्य पिता-माता और गुरु के पावनश्रीचरणो में श्रद्धा सुमन समर्पित करते हुए कहना चाहूंगा.
“अज्ञानतिमिरान्धस्य
ज्ञानांजन शलकया।
चक्षुर्न्मुलितं में तस्मै श्रीगुरवे नम:।
श्रीगुर चरण सरोज रज,
निज मन मुकुर सुधार।
बरनुॅ रघुवर विमल यश,
जो दायक फल चारि।।
जय तुलसी, जय हो कबीर
जय विद्यापति, जय गुरुकृपानिधान।
जय योगेश्वर,जय महेश्वर।
जय दिनकर, जय जगजननी जगदम्बा महान।
“मजहब नहीं सीखाता आपस वैर करना,
हिन्दी हैं, हम वतन है, हिन्दुस्तां हमारा।
सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा।
हम बुलबुले हैं इसके ये गुलिस्तां हमारा।
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