27 June 2022

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कहो खुल के

हिन्दी सेवा का अर्थ राष्ट्र सेवा

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हिन्दी सेवा का अर्थ राष्ट्र सेवा
by- डॉ विजय शंकर
हिन्दी है हम-वतन है
               हिन्दुस्तां हमारा
14 सितंबर (हिन्दी दिवस) इसी दिन राष्ट्रीय भाषा के रुप में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने का स्तुत्य प्रयास हुआ था. मगर हिन्दी आज भी उस स्थान पर मज़बूती के साथ स्थिर और निश्चिंत नहीं है, वह अंग्रेजी के चौंधियाई रौशनी में खुद को असहज, विस्मित और अभावबोध से पीड़ित, चिंतनशील है.
आजादी के दीवानों में राष्ट्रभाषा, राष्ट्रीय झंडा, राष्ट्रगान के प्रति जो दिवानगी थी, क्रमशः आजादी के पश्चात संकुचित विचार, सत्ता बनाने और बचाने का नितनूतन तिकड़म के रुप में, मूलभूत समस्साओं से ध्यान हटाकर, भाषा-धर्म,क्षेत्रीय राजनीति में मशगूल हो गई.
इसी का एक जीता-जागता मिसाल है राष्ट्रभाषा हिन्दी का अपमान, विरोध और उसपर पकायी, सेंकी जानेवाली रणनीतिक राजनीति.
हिन्दी भाषा की दिशा और दशा आज कमोवेश भारत-इंडिया में विभाजित हो गई है, जहाँ इंडिया, अंग्रेजी से चमत्कृत और अभिभूत होकर, श्रेष्ठतम की टीका टाँक बैठी है, वहीं भारत की दुर्गति, दुर्दशा, आदि उपाधियों से हिन्दी अभिशप्त है.
अंत में, एक कहावत आपने सुनीं होगी कि “हमें अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था, मेरी किश्ती डूबी थी वहाँ जहाँ पानी कम था. हमारी हिन्दी की यही वेदना, पीड़ा, उसे अन्दर से झँकझोर रही है, उसके अपने लाड़लों ने भी उससे किनारा करना शुरु कर दिया है.
हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्रों में कुकुरमत्ते की तरह उग रहे अंग्रेजी के स्कूल, हिन्दी दिवस मनाने की श्रृंगारिक रस्म अदायगी की परम्परा,  उज्ज्वल भविष्य की संभावना नहीं दिखाती.
क्या कारण है देश की आधे से अधिक आबादी, सत्ता पर सतत काबिज रहने के बाबजूद भी हम उसे वहाँ नही ले जा सके जहाँ से वह राष्ट्र की बिन्दी बनकर चमकती-धमकती और इठलाती.
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा, आइए हम सब मिलकर, इस पावन दिवस पर यह संकल्प लें कि हम खुद हिन्दी पढ़े, कवि-लेखकों की अमिट रचनाओंकोउनके जन्म दिन पर पर खरीदें, उनके तस्वीर घर पर टाँगे, भावी पीढ़ी को हिन्दी की परिवर्तन, परिवर्धन और राष्ट्रसंवर्धनकारी इतिहास से परिचित करावें.
मित्रों, हिन्दी दिवस के पावनावसर पर हिन्दी सेवा में रत सभी प्रत्यक्ष-परोक्ष महानुभावों के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम.
 जो भरा नहीं भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं पत्थर है जिसमें स्वदेश के प्रति प्यार नहीं
लेखक : (डॉ विजय शंकर, आरएल सर्राफ उच्च विद्यालय देवघर में सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं.)
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