24 October 2021

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कहो खुल के

डॉ राधाकृष्णन जी ज्ञान के सागर थे

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शिक्षक दिवस पर विशेष : डॉ राधाकृष्णन जी ज्ञान के सागर थे
by-डॉ श्याम किशोर अंबष्ठ
 
आज ही के दिन पांच सितंबर 1888 को हमारे देश के पहले उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म चेन्नई के तिरुतनी गांव (तमिलनाडू) में हुआ था. वे 21 वर्ष की उम्र में प्रेसिडेंसी कॉलेज में शिक्षक बने, फिर कोलकाता आ गये. फिर आंध्र विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति बने. उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी पढ़ाया. 1949 में सोवियत संघ में भारतीय राजदूत बने. वर्ष 1952 में स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति बने. वर्ष 1962 तक इस पद पर रहे. वर्ष 1962 में भारत के राष्ट्रपति चुने गये, एवं 1969 तक वे राष्ट्रपति रहे. वे एक महान शिक्षाविद् दार्शनिक, महान वक्ता के साथ-साथ एक विचारक भी थे. अपने जीवन में वे 40 वर्ष तक शिक्षक रहे. आज हमारा देश शिक्षक दिवस के रूप में उन्हें याद करता है. आज के दिन हमारे देश में शिक्षकों को सम्मानित कर उन्हें याद करते हैं. वे देश के दूसरे राष्ट्रपति और पूर्व प्रथम राष्ट्रपति एवं भारतरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद के तरह की स्वेच्छिक आधार पर अपने वेतन से कटौती कराया. 17 अप्रैल 1975 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. 
 
डॉ राधाकृष्णन जी ज्ञान के सागर थे. उनकी जीवनी से हमलोगों को बहुत कुछ सीखने का मौका मिलता है. इसी संदर्भ में एक घटना उनकी देशभक्ति एवं ज्ञान को प्रदर्शित करता है. एक बार एक प्रीति भोज के अवसर पर अंगरेजी की तारिफ करते हुए एक अंगरेज ने कहा कि ईश्वर हम अंगरेजों को बहुत प्यार करता है. इसलिए उसने हमारा निर्माण बड़े जतन एवं स्नेह से किया और हम सभी अंग्रेज इतने गोरे तथा सुंदर हैं. सभा में डॉ राधाकृष्णन भी थे. उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगी. फलस्वरूप उन्होंने उपस्थित मित्रों को संबोधित करते हुए एक मनगढ‍़ंत किस्सा सुनाया – मित्रों एक बार ईश्वर को रोटी बनाने का मन हुआ, उन्होंने जो पहली रोटी बनायी वह जरा कम सिकी, जिससे अंगरेजों का जन्म हुआ. दूसरी रोटी कच्ची न रह जाये, इस नाते भगवान ने इस बार जरा चौकन्ने हो गये और सावधानी से रोटी बनाने लगे. इस बार जो रोटी बनी व न ज्यादा पकी थी और न ज्यादा कच्ची रही. एक दम ठीक सिकी थी, और परिणामस्वरूप हम भारतीयों का जन्म हुआ. यह किस्सा सुनकर अंग्रेज शर्मशार हो गये और बांकि लोगों का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया. डॉ राधाकृष्णन जी का मानना था कि व्यक्ति निर्माण एवं चरित्र निर्माण में शिक्षा का विशेष योगदान है. उनके इस कथन को एक उदाहरण से हम समझने की कोशिश करते हैं – एक बार एक शिल्पकार पेड़ के नीचे थका हारा बैठा था. अचानक उसकी नजर पास पड़े एक पत्थर पर पड़ी. उसने सोचा कि इस पत्थर की मूर्ति बनाता हूं और झोली से छेनी हथौड़ा निकाल कर पत्थर पर मारने लगा तो पत्थर रो-रो कर कहने लगा कि मुझे छोड़ दो, मुझे मत मारो. तक शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़कर दूसरे पत्थर की मूर्ति बनाने लगा. दूसरा पत्थर छेनी हथौड़े की मार सहता रहा और अंत में उस पत्थर की एक सुंदर मूर्ति बन गयी. शिल्पकार उस मूर्ति को वहीं छोड़ कर चला गया. दोबारा जब वो उसी रास्ते से गुजरा तब उसने देखा कि उसकी बनायी मूर्ति की पूजा हो रही थी और जिस पत्थर को उसने छोड़ दिया था. उस पर सभी श्रद्धालुगण नारियल फोड़ रहे थे. 
 
अर्थात इस छोटी कहानी से हमें यह पता चलता है कि अगर हमसे कोई अधिक काम, परिश्रम कराता है तो हमें उदास या रोना नहीं चाहिए. बल्कि मेहनत कर के सभ्य इंसान बनना चाहिए. साथ ही इस कहानी में जो शिल्पकार हैं. उनकी भूमिका जीवन में शिक्षक निभाते हैं और हम सभी पत्थर की भांति हैं, जो हमसे कठिन परिश्रम करवाकर शिक्षक हमें सफल बनाते हैं. हमारे शिक्षक जब महत्वपूर्ण ज्ञान देते हैं एवं डांट-फटकार करते हैं तो उनकी बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए, एवं उनके बताये बातों को गांठ-बांध जीना चाहिए. क्योंकि वह बहुमूल्य है. 
सनातक संस्कृति में सृष्टि के आरंभ से ही ज्ञान तत्व की उत्पत्ति हुई है. ज्ञान का तारतम्य गुरू से होता है. “बिन गुरू ज्ञान न कोई” यह दोहा इसकी पुष्टि करता है. गुरू के महात्म के संबंध में कहा गया है कि ‘गुरू गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांव, बलिहारी गुरू आपने, जिन गोविंद दियो बताए’ गुरू-शिष्य की परंपरा सदियों पुरानी है. इसलिए सनातन संस्कृति में प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि को गुरू पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, तथा गुरू के प्रति श्रद्धा, विश्वास एवं समर्पण को समाहित किया जाता है. 
 
हालांकि आधुनिकीकरण के इस दौर में शिक्षक, छात्र एवं शिक्षा तीनों का व्यवसायीकरण हो रहा है. परिभाषाएं बदल रही है. लेकिन, मेरा मानना है कि हमेशा की तरह आज भी शिक्षा व्यवस्था में नैतिकवादी शिक्षा, भौतिकवादी शिक्षा पर भारी है. आज की व्यवस्था में हम समाज से क्या ले सकते हैं. इस बात को छोड़ कर हम समाज को बांध सकते हैं. इस पर विचार करना चाहिए. आज छात्र, शिक्षक एवं शिक्षा तीनों ही मूल्य बर्द्धक सभ्यता को विकसित कर रहे हैं, जो हमारी संस्कृति के लिए सही नहीं है. आज के बदलते दौर में संस्कृति के अनुरूप ही स्वार्थ की ओर पलायन न होकर परमार्थ पर भी ध्यान बनाये रखना चाहिए.

लेखक-डॉ श्याम किशोर अंबष्ठ,
विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर वाणिज्य विभाग 
सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका (झारखंड)
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Author: Bebaak adda

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